इलाहाबाद हाईकोर्ट जमानत रद्द जुर्माना: 'अजनबी' दूसरे के क्रिमिनल मामले में जमानत रद्द करने की मांग नहीं कर सकता; हाईकोर्ट ने ₹25,000 का जुर्माना लगाया
Allahabad High Court Zamanat Radd Jurmana: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने थर्ड पार्टी द्वारा जमानत रद्द करने की अर्जी खारिज की। कोर्ट ने कहा 'अजनबी' को हक नहीं, आवेदक पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया।
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस कृष्ण पहल की बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि कोई भी 'अजनबी' (Third Party) किसी आपराधिक मामले में आरोपी की जमानत रद्द करने की मांग नहीं कर सकता। कोर्ट ने व्यक्तिगत बदले की भावना से "बेकार" याचिका फाइल करने के लिए आवेदक पर ₹25,000 रुपये का जुर्माना लगाया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति आपराधिक कार्रवाई से 'अलग' है, न तो उस खास मामले में इन्फॉर्मर है और न ही विक्टिम, उसे ऐसी राहत मांगने का कोई हक (लीगल स्टैंडिंग) नहीं है।
2012 के केस में जमानत रद्द करने की थी मांग
आवेदक निखिल कुमार ने 16 मार्च 2016 के एक बेल ऑर्डर को रद्द करने के लिए हाई कोर्ट में अर्जी दी थी। यह बेल गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद पुलिस स्टेशन में IPC की धारा 302 (हत्या) और 120-B (आपराधिक साजिश) के तहत दर्ज 2012 के एक केस से संबंधित थी।
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आवेदक की दलील: आवेदक की ओर से तर्क दिया गया कि 2012 के केस में बेल पर रिहा होने के बाद, आरोपी ने कथित तौर पर 9 नवंबर 2017 को आवेदक के पिता की हत्या कर दी थी (जो एक अलग मामला था)। आवेदक ने दलील दी कि आरोपी को 2017 के हत्या के मामले में बेल मिलने की संभावना है, और अगर ऐसा होता है, तो वह आवेदक की हत्या सहित अन्य अपराध कर सकता है, क्योंकि आरोपी का "23 मामलों का लंबा क्रिमिनल इतिहास" है।
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बचाव पक्ष का तर्क: आरोपी के वकील ने विरोध करते हुए कहा कि आवेदक का 2012 के केस से कोई लेना-देना नहीं है, और वह न तो गवाह है और न ही विक्टिम। यह एप्लीकेशन सिर्फ कोर्ट की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल है।
अदालत का फैसला
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि किसी भी अजनबी द्वारा क्रिमिनल प्रोसीडिंग्स में कोई भी एप्लीकेशन एंटरटेन नहीं की जा सकती।
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खारिज: कोर्ट ने 2012 के केस में दिए गए बेल ऑर्डर को रद्द करने का कोई आधार नहीं पाया और याचिका खारिज कर दी।
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जुर्माना: आवेदक निखिल कुमार पर ₹25,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है, जिसे दो हफ्ते के अंदर हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के अकाउंट में जमा करना होगा।