राजनीति: पूर्व उपराष्ट्रपति धनखड़ का स्वागत करने एयरपोर्ट नहीं पहुंचा कोई BJP नेता, दिग्विजय सिंह बोले- यही है 'यूज एंड थ्रो' की नीति
Rajniti: पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का स्वागत करने BJP नेता नहीं पहुंचे। दिग्विजय सिंह ने साधा निशाना, बोले- यह BJP की 'यूज एंड थ्रो' की नीति है।
नई दिल्ली: पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेने के दौरान हवाई अड्डे पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के किसी भी बड़े नेता की गैरमौजूदगी ने राजनीति गलियारों में हलचल मचा दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इस घटना को लेकर बीजेपी पर तीखा तंज कसा है और इसे पार्टी की "इस्तेमाल करो और फेंको (Use and Throw)" की नीति करार दिया है।
चार महीने पहले स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने वाले जगदीप धनखड़ ने शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ पदाधिकारी मनमोहन वैद्य की लिखी एक पुस्तक के विमोचन के मौके पर अपना पहला सार्वजनिक संबोधन दिया।
एयरपोर्ट पर नेताओं की गैरमौजूदगी पर तंज
राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने एयरपोर्ट पर बीजेपी नेताओं की गैरमौजूदगी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह घटना बीजेपी के वास्तविक चरित्र को दर्शाती है।
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दिग्विजय सिंह का आरोप: उन्होंने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा कि बीजेपी केवल उन्हीं लोगों को महत्वपूर्ण मानती है जो उसके हितों की पूर्ति करते हैं। पार्टी "इस्तेमाल करो और फेंको" की नीति पर चलती है।
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मुलाकात की कोशिश: दिग्विजय सिंह ने यह भी बताया कि उन्होंने पूर्व उपराष्ट्रपति से मिलने के लिए उनके साथ आए अधिकारी से समय भी मांगा था।
धनखड़ ने ड्यूटी को बताया सर्वोपरि
आरएसएस के कार्यक्रम में अपना पहला सार्वजनिक संबोधन देते हुए जगदीप धनखड़ ने अपने कर्तव्यपरायणता (Duty) को सबसे ऊपर रखा।
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ड्यूटी को महत्व: भाषण के दौरान जब एक व्यक्ति उन्हें याद दिलाने आया कि उन्हें शाम 7:30 बजे दिल्ली वापस जाने के लिए उड़ान में सवार होना है, तो धनखड़ ने कहा, "मैं विमान में सवार होने के लिए अपनी ड्यूटी नहीं छोड़ सकता, और दोस्तों, मेरा हाल का अतीत इसका सबूत है।"
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RSS की तारीफ: कार्यक्रम में जगदीप धनखड़ ने आरएसएस की सोच और दृष्टिकोण की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि मनमोहन वैद्य की यह किताब उस प्रचार को गलत साबित करती है, जिसमें संघ को एक अति दक्षिणपंथी संगठन के तौर पर दिखाया जाता है और इसे महात्मा गांधी की हत्या से जोड़ने की कोशिश की जाती है।
राजनीति के इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सत्ताधारी दल अपने पुराने और प्रतिष्ठित सहयोगियों के प्रति किस तरह का सम्मान प्रदर्शित करते हैं।